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बेक्ड़ेल टेस्ट
                                     

ⓘ बेक्ड़ेल टेस्ट

बेक्ड़ेल टेस्ट को अमरीकी व्यंगचित्रकार एलिसन बेक्ड़ेल का नाम दिया गया है। यह टेस्ट इस बात को प्रमाणित करता है की किसी काल्पनिक उपन्यास, फिल्म, इत्यादि में दो अथवा दो से अधिक महिला पात्र हैं, जो एक दुसरे से पुरुषों के अलावा किसी अन्य विषय के बारे में बात करती हैं। इस टेस्ट की एक अपेक्षा यह भी होती है कि दो महिलाओं के नाम उल्लेखित किये जाएँ।

उपभोगताओं द्वारा सम्पादित डेटाबेस एवं मीडिया इंडस्ट्री प्रेस के अनुसार केवल ५०% इन शर्तों को पूरा करती हैं। यह टेस्ट इस बात का प्रमाण है कि महिलाएं सक्रिय रूप से फिल्मों एवं अन्य रचनाओं में सम्मिलित हैं। इसका उपयोग लिंग असमानता एवं लिंगवाद की ओर संकेत करने में भी होता है।

इस टेस्ट को बेक्ड़ेल -वॉलेस टेस्ट के नाम से भी जाना जाता है। बेक्ड़ेल टेस्ट का पहला उल्लेख एलिसन बेक्ड़ेल की कॉमिक Dykes to Watch Out For में १९८५ में किया गया। बेक्ड़ेल ने इस विचार का श्रेय अपनी मित्र लिज़ वॉलेस, और वर्जिनिया वुल्फ़ की रचनाओं को दिया। २१ वीं सदी में जब इस टेस्ट के बारे में चर्चा बढ़ने लगी, तो इस के सामान कई अन्य टेस्ट प्रयोग में लए जाने लगे। ण

                                     

1.1. इतिहास लोकप्रिय उपन्यास में लिंग चित्रण

जो बातें वर्जिनिया वुल्फ़ ने १९२९ में लिखे अपने निबंध- अ रूम ऑफ़ वन्स ओन नामक कॉमिक में दो महिलाओं को जो भविष्य में मो और जिंजर के किरदार बनीं, एक फिल्म के विषय में चर्चा करते हुए दिखाया गया है। उनमे जो ब्लैक महिला है, वह समझाती है की वह फिल्म देखने तभी जाती है जब निम्नलिखित शर्तें पूरी हों:

  • एक पुरुष के अलावा किसी अन्य विषय पर बात करें।
  • वे एक दुसरे से बात करें,
  • फिल्म में कम से कम दो महिलाएं हों,

व्हाइट महिला कहती है की यह विचार सख्त है, परन्तु अच्छा भी है। जब उन्हें यह समझ आता है की कोई भी फिल्में उनकी शर्तों पर खरी नहीं उतरतीं, तो वे साथ घर लौट जाती हैं।

                                     

1.2. इतिहास सेक्सी लैंप टेस्ट

वर्ष २०१२ में हास्य पुस्तक लेखिका कैली सू डीकॉंनिक ने एक अलग टेस्ट का प्रस्ताव रखा, जिसे सेक्सी लैंप टेस्ट का नाम दिया गया। उनका कहना यह था की "यदि महिला किरदार की जगह एक कामुक लैंप को खड़ा कर दिया जाए और कहानी तोह भी आगे बढ़ सकती हो, तो कथानक के पुनर्लेखन की आवश्यकता है।

                                     

1.3. इतिहास स्फिंक्स टेस्ट

वर्ष २०१५ में लंदन की स्फिंक्स थिएटर कंपनी ने नाटककारों को महिलाओं के लिए अधिक और अच्छे किरदार लिखने के लिए प्रोत्साहित करने हेतु स्फिंक्स टेस्ट का प्रस्ताव रखा। यह प्रस्ताव इस लिए दिया गया था क्यूंकि एक शोध में यह पता लगा की वर्ष २०१४ में नाटकों में केवल ३७% रोल महिलाओं के लिए लिखे गए थे। इस टेस्ट में देखा जाता है की महिलाओं की अन्य पात्रों के साथ क्या बातचीत है, महिला पात्र कितने सक्रिय हैं, उन्हें कितने प्रतिक्रियाशील रूप में दर्शाया गया है, और उनके किरदार को किस हद तक रूढ़िबद्ध धारणा से देखा गया है।

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