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ⓘ संकल्पसूर्योदय. सङ्कल्पसूर्योदय महान दार्शनिक कवि वेङ्कटनाथ वेदान्त देशिक द्वारा रचित एक उच्च कोटि का आद्योपान्त विशुद्ध रूपक कथात्मक नाटक है। यह वेदान्त दर्शन ..




                                     

ⓘ संकल्पसूर्योदय

सङ्कल्पसूर्योदय महान दार्शनिक कवि वेङ्कटनाथ वेदान्त देशिक द्वारा रचित एक उच्च कोटि का आद्योपान्त विशुद्ध रूपक कथात्मक नाटक है। यह वेदान्त दर्शन और वैष्णव धर्म के विशिष्टाद्वैतवाद का प्रतिपादक नाटक है, जिसे कृष्णमिश्र के प्रबोधचन्द्रोदय का एक प्रत्युत्तर कह सकते है। सुहृद भगवान का इसको मुक्त करूंगा सत्य संकल्प ही इस नाटक का प्रतिपाद्य विषय है।

वेदान्तदेशिक का समय १३वीं शती का उत्तरार्ध है। वे एक महान दार्शनिक थे। यदि वेदान्त का उद्देश्य मानव को सन्मार्ग से उसके गन्तब्य पर पहुंचाना है, और उसे यात्रा और गन्तव्य के विषय में पूर्णज्ञान कराते हुए जीवन-यात्रा में उसका पथप्रदर्शन करना है, तो निश्चय ही वैष्णव आचार्य वेंकटनाथ इस नाटक की रचना करने के वास्तविक अधिकारी थे।

जनश्रुति के अनुसार यह विश्वास है, कि नाटक को लेखक ने एक रात्रि में लिखा है। जनश्रुति यह भी है कि नाटक की रचना प्रबोधचन्द्रोदय के प्रतिपक्ष में की गई थी, किन्तु दोनों लेखकों का समसामायिक होना अनैतिहासिक है। नाटक रचना का स्थान श्रीरंगम है। नाटक की रचना मलिककाफूर के दक्षिण आक्रमण के पहिले हुई होगी।

संकल्पसूर्योदय की प्रस्तावना के अनुसार वेङ्कटनाथ अनन्त सूरि के पुत्र थे, जो कांची में रहते थे।

                                     

1. नाटक का संक्षिप्त कथासार

संकल्पसूर्योदय में दस अङ्क हैं जिसमें देहधारियों के गुण, रूप, विवेक, सुमति, व्यवस्थादि और मोह, दुर्मति, लोभ आदि पात्र रूप से कल्पित किये गये हैं। इनमें विवेक और सुमति आदि सात्विक गुण हैं और मोह एवं दुर्मति तामस तथा राजस गुण हैं। परत्पर शुद्धाशुद्ध आदि का विवेचन रूप विवेक इसका धीरोदात्त नायक हैं। पुरूष का संसार से छुटकारा नायक का अभीष्ट प्रयोजन है। संसारिक ताप से अत्यन्तद मनुष्य शरीर की रक्षा का इच्छुक, विवेक, नायिका सुमति आदि को साथ लेकर पुरूष में सांसारिक विषय सुखों की विरक्ति पैदा कर उसे समाधि में लगाने का प्रयत्न करता है। मोह जो प्रतिनायक है और विवेक का शत्रु है, दुर्मति पत्नी आदि सहायकों को साथ लेकर पुरूष में भौतिक सुख लोलुपता पैदा कर उसे संसार में ही अत्यन्त आसक्त रखने के लिये तत्पर होता है। अन्त में विवेक सपरिवार मोह को पराजित कर पुरूष को परब्रह्म की समाधि में स्थापित कर भगवान की कृपा से होने वाले भगवत्संकल्प के द्वारा संसारोन्मुक्त कर परब्रह्म के अनुभव रूप मोक्ष साम्राज्य को प्राप्त करता है।

                                     
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